कालेसर राष्ट्रीय उद्यान, जिला - यमुनानगर

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कलेसर राष्ट्रीय उद्यान शक्तिशाली हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला की पैर पहाड़ियों में स्थित है। यह मानचित्र पर उत्तरी अक्षांश में 300 18 से 300 27 के बीच तथा पूर्वी देशांतर में 770 25 से 770 35 पर स्थित है। यह हरियाणा के यमुनानगर जिले में आता है तथा इसकी सीमा तीन राज्यों से लगी हुई है, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल और उत्तरप्रदेश। उत्तर प्रदेश के पूर्वी सीमा से यमुना नदी, मुख्य शिवालिक पर्वत श्रेणी, हरियाणा के बीच राज्य की सीमा को अलग करती है, उत्तर में हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल।

कलेसर नेशनल पार्क, संरक्षित क्षेत्र में स्थित कलेशर (शिव) मंदिर के नाम पर है। पूरा क्षेत्र जैव विविधता गुफाओं के साथ साल वन, खैर के जंगल और घास भूमि के धब्बों से भरा है, जो पौधों और जानवरों की प्रजातियों की एक अद्भुत विविधता का समर्थन करता है।

8 दिसंबर 2003 को पार्क का क्षेत्र 11570 एकड़ होने पर उसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। राष्ट्रीय उद्यान के निकट कलेसर वन्यजीव अभयारण्य है, इसका क्षेत्र 13209 एकड़ होने पर इसे 13 दिसंबर, 1996 को अधिसूचित किया गया था।

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पहुँच और प्रवेश

यमुनानगर पोंटा साहिब राज्य राजमार्ग कलेसर नेशनल पार्क से होकर गुजरता है। यह यमुनानगर से लगभग 45 किलोमीटर, पोंटा से 15 किलोमीटर और देहरादून से 55 किलोमीटर है। यह सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है तथा यमुनानगर और पोंटा साहिब से अच्छी सेवाएं चल रही हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन यमुनानगर में स्थित है।

महत्व का विवरण

कलेसर राष्ट्रीय पार्क को देश में, जैव विविधता तथा पारिस्थितिक स्थिरता के संदर्भ में बहुत महत्व मिला है। जैव विविधता के मामले में यह कई औषधीय पौधों का भंडार है। यह तेंदुआ, घोरल, बार्किंग डीयर, सांभर, चीतल, अजगर, किंग कोबरा, मॉनिटर छिपकली आदि कई खतरनाक जानवरों का घर है। कभी कभी बाघ और हाथी, राजाजी नेशनल पार्क से इस पार्क में आते हैं। यदि इस पार्क में वास प्रबंधन में थोड़ा सुधार किया जाता है, तो बाघ और हाथी यहां साल भर रह सकते हैं। इसलिए यह पार्क बाघ और हाथी जैसे अत्यधिक खतरनाक पशुओं के संरक्षण में बहुत महत्वपूर्ण है। ये आवास राजाजी नेशनल पार्क से आने वाले इन दो जानवरों के लिए वैकल्पिक घर प्रदान कर सकते हैं।

पुराने हिमालय पर्वतमाला से मलबे द्वारा गठित शिवालिक, रेत पत्थर, मिट्टी और पिंडो के संगठन तथा एक अत्यधिक नाजुक प्रणाली के तलछटी चट्टानों से बना है। भारी बारिश के दौरान तेज बहाव के कारण यहां बहुत अधिक कटाव है। घाटियां और भूमि की चिकनी सतह आम हैं तथा घाटी नीचे और नालों में ज्यादातर पत्थ़र और कंकड़ बिखरे पड़े हैं। मानसून के दौरान प्रचण्डी धारा से पत्थर और गंदा पानी बह जाते हैं जिसके कारण मैदानी इलाकों में बाढ़ आ जाती है। तो यह संरक्षित क्षेत्र इस तरह के बाढ़ को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पारिस्थितिक स्थिरता को बनाए रखने में मदद करता है। हरियाणा में केवल यही राष्ट्रीय उद्यान है जहां इतनी बड़ी जैव विविधता के साथ अच्छा प्राकृतिक वन है। इसीलिए इसको संरक्षण, शिक्षा, पर्यटन और अनुसंधान के अवसरों के मामले में एक विशेष महत्व मिला है।

सीमाएँ

पूरे नेशनल पार्क और अभयारण्य क्षेत्र विधिवत अधिसूचित हैं तथा खंभे, नदियों और पानी के प्रवाह जैसी प्राकृतिक सीमाओं की मदद से जमीन पर सीमांकन किया गया है। राष्ट्रीय उद्यान के उत्तर में, सिंबलवाड़ा वन्यजीव अभयारण्य (हिमाचल प्रदेश) को रिज लाइन (संकरा ऊंचा भाग) से अलग किया गया है तथा खंभों के द्वारा चिह्नित किया गया है। पूर्व में यमुना नदी उत्तर प्रदेश के साथ पार्क की सीमा बनाती है। पार्क के दक्षिण में गांवों की कृषि भूमि अर्थात, तजेवाला अरेनवाला, नाग्ग्ल, तिबेरियन, खिजरी, बागपत, खिलनवाला, कंसली, दारपुर चिकन, जटांवल और कोट, तट पर स्थित हैं। पार्क का पश्चिमी क्षेत्र फकीरमाजरा और इब्राहिमपुर गांव के खेतों की फसल से घिरा है।

पशु

वास प्रकार के पर्याप्त विविधता के अनुरूप, कलेसर संरक्षित क्षेत्र में जंगली जानवरों के प्रजातियों की एक अच्छी किस्म दिखाई पड़ती है। हालाकि, अभी वर्तमान में अपेक्षाकृत संख्यां कम है, किन्तु पार्क के अधिकारियों द्वारा प्रदान की गई पूर्ण सुरक्षा के कारण, कुछ वर्षों में जनसंख्याक में क्षेत्र की पूरी वहन क्षमता तक वृद्धि होगी। इनमें शाकाहारी सांभर आम हैं, विशेष रूप से कोमल ढलानों पर अधिक घने वन क्षेत्रों में, 2 से 4 के समूह में अक्सर देखा जाता है। चीतल खुले घास के धब्बे और फायर लाइनों में पाया जाने वाला एक और आम शाकाहारी है। बार्किंग डीयर विशेष रूप से पर्याप्त भूमि में फैले वन क्षेत्रों में पाया जाता है। गोरल, शिवालिक लकीरों के शीर्ष पर अपेक्षाकृत नंगे चट्टानी ढाल पर, पार्क में एक विशेष झरोखों में पाया जाता है।

हिरण, नीलगाय या नीलबैल द्वारा प्रतिनिधित्व किये जाते हैं, जो यमुना मैदान की सीमा में अधिक खुले क्षेत्रों में पाया जाता है। जंगली सूअर भी पार्क में काफी आम है और ये फसलों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। हाथी, राजाजी नेशनल पार्क से कभी कभी आते हैं। हाथी कुछ हफ्तों के लिए कलेसर संरक्षित क्षेत्र को रहने के लिए इस्तेमाल करते हैं और फिर राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के लिए वापस चले जाते हैं। यदि अच्छे जलाशय उपलब्ध कराये जाते हैं तो यह लंबे समय के लिए रह सकते हैं।

रीसस मकाक पार्क में सबसे सामान्य बंदर है और इनमें से ज्यादातर बाहर से पार्क क्षेत्र में छोड़े गए हैं। वर्तमान में इनकी संख्या बहुत अधिक है, ये बंदर लाल जंगली मुर्गियों के अंडो को भी खाते हैं, इसलिए लाल जंगली मुर्गियों की संख्या में कमी होने की आशंका है। ये बंदर कई बार गावों में धावा बोल देते हैं तथा फसलों कों भी नुकसान पहुँचाते हैं। मांसाहारी जीवों में तेंदुआ, कलेसर संरक्षित क्षेत्र में अपना दबदबा बनाये हुए हैं। पूरे संरक्षित क्षेत्र में लगभग 10 से 12 तेंदुए हैं। बाघ भी राजाजी राष्ट्रीय पार्क से कभी कभी यहां आते हैं। ये कुछ दिन यहां रहते हैं फिर वापस चले जाते हैं। यदि इन्हें यहां पर्याप्त मात्रा में शिकार उपलब्ध हो तो ये पार्क में स्थांयी रूप से रह सकते हैं।