गिद्धों के संग्रह के लिए क्रियाविधि

img2

गिद्धों के संग्रह के लिए क्रियाविधि

यहां केंद्र में कुल 127 पक्षी हैं जिनमें से 55 सफेद पीठ वाले गिद्ध, 55 लंबी चोंच वाले गिद्ध, 15 पतले चोंच वाले गिद्ध और 2 हिमालय ग्रिफोंस हैं। 55 सफेद पीठ वाले गिद्धों में से दो किशोर गिद्धों की उत्पत्ति वर्ष 2007-08 के प्रजनन काल के दौरान केंद्र में ही हुई है और तीन, 2008-09 के प्रजनन काल के हैं। 15 पतले चोंच वाले गिद्धों में से 1 किशोर गिद्ध की उत्पत्ति केंद्र में ही हुई है।

गिद्धों को विभिन्न राज्यों से केंद्र में लाया गया है। पक्षियों को निम्नालिखित राज्यों से लाया गया है गुजरात से (N=35), राजस्थान से (N=22), महारष्ट्र से (N=21), हरियाणा से (N=20), मध्य प्रदेश से (N=17), असम से (N=14), और दिल्लीं से (N=1)। दो हिमालय ग्रिफोंस हरियाणा से लाकर बचाये हुए है तथा ये प्रजनन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं।

अब तक हमने केंद्र में 9 सफेद पीठ वाले गिद्ध और 3 लंबी चोंच वाले गिद्धों को खो दिया है।

पक्षियों के चूजों का संग्रह

चूजों को वनों से तब संग्रह किया जाता है जब वे 45 दिन के हो जाते हैं इतने दिनों में उनके शरीर का तापमान भी अच्छी तरह से विकसित हो जाता है और उन्हें चोंच से खाना खिलाने की आवश्यककता भी नहीं होती है। पक्षियों की सबसे अधिक मृत्यु दर वनों से चुजों के एकत्रीकरण के समय होती है, इसलिए पिंजरे में चूजों को लाने से उनकी रक्षा होती है। सफेद पीठ वाले गिद्ध तथा पतले चोंच वाले गिद्ध लंबे वृक्षों पर घोंसले बनाते हैं, कभी कभी तो ये 80 मीटर लंबे वृक्षों पर भी अपने घोंसले बनाते हैं। लंबे चोच वाले गिद्ध चट्टानों में घोंसले बनाते हैं, ये गिद्ध आम तौर पर दुर्गम चट्टानों पर अपने घोंसले बनाते हैं। अक्सर इनके घोंसले गहरी गुफा में खड़ी चट्टानों की उपरी सतह पर होते हैं। चूजों का संग्रह, गिद्धों को संभालने में प्रशिक्षित विशेषज्ञ पर्वतारोहियों की मदद से ही संभव होता है। चूजों को विशेष रूप से बनाये गये थैले में एकत्र किया जाता है और उन्हें जमीन पर इंतजार कर रही टीम तक एक रस्सी की मदद से उतारा जाता है। चूजों को जमीन में उतारने के बाद उन्हे विशेष रूप से तैयार लकड़ी के बक्से में रखा जाता है।

अब तक 7 सफेद पीठ वाले गिद्ध और 35 लंबे चोंच वाले गिद्ध जंगल से लाये जा चुके हैं।

गिद्धों को फँसाना

उप वयस्क और वयस्क गिद्धों को सफलतापूर्वक साँप जाल विधि की मदद से जंगल से फंसाया गया है। यह पद्धति पूरी तरह से गैर आक्रामक, त्वरित, सस्ती, और बहुत प्रभावी है। एक ताजा मवेशी या बकरी का शव चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और गिद्ध को फँसाने वाला शव से लगभग 10-15 मीटर की दूरी पर घास में छुपा रहता है तथा गिद्ध के खाने का इंतजार करता है। वह 60 फीट लंबा और सिमटने वाला बॉंस के खंभे का उपयोग करता है। बांस का आखिरी छोर लगभग 3’ लंबा, बहुत कोमल, पतली और दो शाखाओं वाली होती है। यह बहुत चिपचिपा गोंद से लेपित होता है जो पीपल (Ficus religiosa) के दूध और सरसों के तेल का मिश्रण होता है। गिद्ध जब शव को खाना शुरू करता है, तब बांस के खंभे को घास पर छिपा हुआ फंसानेवाला धीरे-धीरे जमीन पर, चारा चर रहे गिद्ध की तरफ खिसकाता जाता है। जब बांस लगभग 5 फीट की दूरी पर होता है तब फंसानेवाला तेजी से चारा चर रहे गिद्ध के शरीर पर बांस को छुआता है। गिद्ध तो उड़ान भरने में असमर्थ होता है तब फंसानेवाला जाता है ओर पक्षी को पकड़ लेता है। गोंद पंखों को नुकसान नहीं पहुंचाता है और किसी भी वनस्पति तेल के साथ आसानी से निकल जाता है। कुल 14 सफेद पीठ वाले गिद्ध और 14 सबसे लुप्तप्राय पतले चोंच वाले गिद्धों को इस पद्धति की मदद से फंसाया गया है।

गिद्धों का बचाव

38 सफेद पीठ वाले गिद्धों को बचा लिया गया है और इस प्रजनन केंद्र में लाया गया है। इनमें से 33 पक्षियों को “उत्तरायण” त्योहार में पतंग उड़ाने के दौरान बचाया गया है। पक्षियों की एक अच्छी संख्या पतंग तार के कारण गंभीर रूप से घायल हो जाती है। पतंग के तार में ग्राउंड कांच की परत चढ़ाई जाती है ताकि दूसरे पतंगों के साथ पेंच लड़ाते समय उनके तार को काटा जा सके। उड़ते हुए पक्षी इन तारों में उलझ जाते हैं और उन्हें गंभीर चोटें लग जाती हैं। कई पक्षियों के पंख गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं और वो जीवन भर के लिए अपंग हो गए हैं जबकि कई पक्षियों की अत्यपधिक रक्तस्राव के कारण मृत्यु हो गई है। गुजरात वन विभाग, पशु स्वास्थ्य फाउन्डेशन गुजरात और VCBC, पिंजौर के बर्ड कंजर्वेशन सोसायटी द्वारा आयोजित गिद्ध राहत शिविरों में इन पक्षियों के लिए प्राथमिक चिकित्सा देखभाल और आवश्यकता पड़ने पर शल्य चिकित्सा, प्रदान की है। पक्षियों को उसके बाद पिंजौर ले जाया गया जहां वे प्रजनन कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं।

कुल 4 सफेद पीठ वाले गिद्ध और 1 लंबे चोंच वाले गिद्ध को विभिन्न व्यक्तियों, गैर सरकारी संगठनों और राज्यों के वन विभागों के द्वारा बचाया गया है, तथा उन्हें केन्द्र भेज दिया गया है।