जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र, पिंजौर
     (क) जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र, पिंजौर
      जटायु कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर (जेसीबीसी), हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) की एक संयुक्त परियोजना है। यह तीन प्रजातियों के गिद्धों को विलुप्त होने से बचाने के लिए एक सहयोगात्मक पहल है, सफेद पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतले चोंच वाले गिद्ध। यह केंद्र बी शिकारगाह वन्यजीव अभयारण्य के किनारे जोधपुर गांव में स्थित है जो मल्लाह रोड पर पिंजौर राष्ट्रीय राजमार्ग -22 से 8 किमी दूर है। केंद्र हरियाणा वन विभाग की 5 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है।
 जेसीबीसी, जो पहले वुल्चर केयर सेंटर (वीसीसी) के नाम से जाना जाता था, की स्था्पना ब्रिटेन सरकार के डार्विन पहल प्रजातियों की जीवनरक्षा के लिए निधि, के साथ निवासी गिप्स प्रजातियों के गिद्धों में नाटकीय गिरावट की जांच के लिए सितंबर 2001 में हुई थी।

      फरवरी 2004 में दक्षिण एशिया वुल्चर रिकवरी प्लान के बाद, रिकवरी योजना के एक महत्वपूर्ण सिफारिश के क्रम में, गंभीर खतरे में पड़ने वाले गिद्धों की तीन गिप्स प्रजातियों के संरक्षण हेतु संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम स्थापित करने के लिए, वीसीसी को पहले जेसीबीसी के रूप में रूपांतरित एवं उन्नत किया गया था।
वर्तमान में केंद्र में कुल 160 गिद्ध हैं जिनमें 63 सफेद पीठ वाले गिद्ध, 74 लंबे चोंच वाले गिद्ध, 21 पतले चोंच वाले गिद्ध और 2 हिमालय से आये हुए गिद्ध शामिल हैं। यह दुनिया में कहीं भी एक ही स्थान पर गिद्ध की तीन गंभीर खतरे वाले गिप्स प्रजातियों का सबसे बड़ा संग्रह है।



      केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, ब्रिटेन सरकार की प्रजातियों के अस्तित्व के लिए डार्विन पहल, पक्षियों के संरक्षण के लिए रॉयल सोसाइटी (आरएसपीबी) और लंदन के जूलॉजिकल सोसायटी का तकनीकी समर्थन और शिकार करने वाले पक्षियों के लिए इंटरनेशनल सेंटर ब्रिटेन से वित्तीय सहायता के साथ, एक पूर्व नियोजित योजना, संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया गया था।

      यह केंद्र, एशिया में अपनी तरह का पहला केंद्र है और इन गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में प्रमुख योगदान करने के लिए तैयार है। यह केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा भारत में गिद्ध संरक्षण के लिए समन्वयक चिड़ियाघर के रूप में नामित किया गया था।
केंद्र एक बंद प्रदर्शन अनुसंधान सुविधा है और जनता के लिए खुला नहीं है।

(ख) वर्ष 2012-13 की मुख्य विशेषताएं
1. इंटरप्रिटेशन सेंटर का उद्घाटन
       श्री रामेन्द्र जाखु, आईएएस, अपर मुख्य सचिव, वन, हरियाणा सरकार ने श्री सी.आर. जोत्रिवाल, आईएफएस, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, हरियाणा, डॉ. (श्रीमती) अमरिंदर कौर, आईएफएस, अपर प्रधान महा वनसंरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रबंधक, हरियाणा, श्री आर.के. सपरा, आईएफएस, अपर प्रधान महा वनसंरक्षक और हरियाणा वन विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में 17 मई, 2013 को जटायु कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर में जटायु इंटरप्रिटेशन सेंटर का उद्घाटन किया। यह इंटरप्रिटेशन सेंटर देश के विभिन्न भागों से वन और वन्य जीवन के प्रशिक्षु अधिकारियों को संरक्षण प्रजनन में प्रशिक्षण देने के लिए, तथा भारत और विदेशों से आने वाले जीवविज्ञानियों एवं वैज्ञानिकों की यात्रा के लिए भी उपयोग किया जाएगा। केंद्र में प्रक्षेपण की सुविधा है तथा सीसीटीवी के मॉनीटर भी उपलब्ध हैं जो पक्षीशाल में लगाए गए हैं। सीसीटीवी उन्हे परेशान किये बिना पक्षीशाला में गिद्धों का निरीक्षण करने के लिए एक बहुत अच्छा साधन है और पक्षीशाला के कामकाज को भी वास्तव में अंदर जाये बिना समझाया जा सकता है। इंटरप्रिटेशन सेंटर में दो प्रदर्शनी है जिसमें पक्षीशाला और उन में रखे गिद्धों को स्पष्ट रूप से उन्हें परेशान किये बिना खिड़कियों से देखा जा सकता है। इसलिए प्रशिक्षुओं को मुख्य प्रजनन केंद्र में जाने की जरूरत नहीं है, वे इंटरप्रिटेशन कमरे में बैठे हुए केंद्र के पूरे कामकाज को देख सकते हैं।


2. संभव - वर्ष 2012-13 का पहला गिद्ध नवेली (पक्षी का छोटा बच्चा)
 कृत्रिम ऊष्मायन द्वारा रचा गया एक सफेद पीठ वाले गिद्ध को, रमेन्द्र जाखू अपर मुख्य सचिव, वन, हरियाणा द्वारा 17 मई 2013 को “संभव” नाम दिया गया। फिर उन्होंने उसे प्रदर्शन दड़बा में छोड़ दिया। यह केंद्र में इस साल का प्रथम नवेली पक्षी था। श्री जाखू ने केंद्र में गिद्धों की सभी तीन प्रजातियों के सफल प्रजनन के लिए तथा कृत्रिम ऊष्मायन की तकनीक में महारत के लिए केन्द्र को बधाई दी। नवेली शब्द, उस युवा पक्षी के लिए इस्तेंमाल किया जाता है जिसने अभी अभी उड़ना शुरू किया हो।


3. नये कालोनी दड़बा का उद्घाटन
      श्री सी.आर. जोत्रिवाल, आईएफएस, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, हरियाणा ने 26 अक्टूबर 2013 को गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र में हरियाणा वन विभाग द्वारा निर्मित कालोनी दड़बा का उद्घाटन किया।
100x40x20' का यह विशाल दड़बा 35-40 गिद्धों के झुंड का घर होगा। श्री जोत्रिवाल ने औपचारिक रूप से पट्टिका का अनावरण द्वारा उद्घाटन करने के बाद दड़बा में एक लंबे चोंच वाले गिद्ध को छोड़ा। इसके बाद डॉ. अमरिंदर कौर, आईएफएस, एपीसीसीएफ एवं मुख्य प्राणी वार्डन श्री आरके सपरा, आईएफएस एपीसीसीएफ तथा श्री के. एस. चौहान, आईएफएस, सीसीएफ ने भी दड्बे में एक एक गिद्ध छोड़े। इस कॉलोनी दड्बे को केंद्र में कैद गिद्धों की बढ़ती संख्या के लिए जगह की कमी की समस्या को हल किया है। दड्बे का निर्माण, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार से प्राप्त अनुदान से हरियाणा वन विभाग द्वारा किया गया था।

4. पीटीटी (प्लेटफार्म ट्रांसमीटर टर्मिनल) के साथ लाल सिर वाले गिद्ध को छोड़ना
      डॉ. (श्रीमती) अमरिंदर कौर, आईएफएस, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रबंधक ने 22 फ़रवरी, 2013 को पीटीटी के साथ एक लाल सिर वाले गिद्ध को छोड़ा। यह इस गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यवहार के अध्ययन के लिए किया गया था। केंद्र ने हाल ही में इस परियोजना की शुरुआत की है और अब तक चार गिद्धों पर पीटीटी डाल दिया है। सैटेलाइट टेलीमेटरी हमें दूर से गिद्धों की हरकतों, बसेरा और नेस्टिंग क्षेत्र को समझने में सक्षम बनाएगा। इससे अलग सीमा और क्षेत्र निर्धारित करना संभव है। उपग्रह ट्रांसमीटर लगभग 70 ग्राम वजन का होता है और एक बैग कवच द्वारा पक्षी से जुड़ा होता है। इस तरह टैग, गिद्ध की पीठ पर आराम से बैठता है।


(ग) उद्देश्य
      • गिद्धों की 3 प्रजातियों में से प्रत्येक के 25 जोड़े की एक संस्थापक आबादी स्थापित करना।
      • जंगल में पुनः लौटाने के लिए 15 वर्षों में प्रत्येक प्रजाति के, कम से कम 200 पक्षियों की आबादी का उत्पादन करना।



(घ) बुनियादी ढांचा
यहां विभिन्न प्रयोजनों के लिए गिद्धों के रहने हेतु अलग दड्बे हैं तथा आवासीय प्रयोगशाला और ऊष्मायन सुविधा के लिए भवन भी हैं।
(क) केंद्र में दड्बे
1. संगरोध दड्बे (20x20x12') वन विभाग की जमीन पर नन्द पुर गांव में केन्द्र के दक्षिण में 5 किमी दूर स्थित हैं। एक समय में 20 पक्षियों को रखने की क्षमता के साथ तीन अस्थायी दड्बे हैं। केंद्र में लाया गया कोई भी पक्षी पहले इन दड्बो में रखा जाता है और उनके स्वास्थ्य पर 45 दिन तक नजर रखी जाती है। वे रोगो से मुक्त हैं यह सुनिश्चित करने के लिए खून और मल के नमूने का हर पंद्रह दिनों में विश्लेषण किया जाता है।




2. अस्पताल दड़बा (12x10x8') में किसी भी घायल या बीमार पक्षी को उपचार और देखभाल के लिए रखा जाता है। केंद्र में प्रत्येक पक्षी को रखने की क्षमता के साथ तीन अस्पताल दड्बे हैं।



3. कालोनी दड्बो (100x40x20') में, कम से कम 45 दिनों की निगरानी के बाद एक प्रजाति के व्यस्क गिद्ध को रखा जाता है। ये दड्बे पक्षियों के एक छोर से दूसरे छोर तक उड़ान द्वारा विंग व्यायाम करने तथा शवों पर सामूहिक रूप से भोजन करने के लिए काफी बड़े हैं बिल्कुल वैसा ही जैसा कि वे जंगल में करते हैं। 40 पक्षियों को रखने की क्षमता वाले इस प्रकार के चार दड्बे हैं। कॉलोनी दड्बे सीसीटीवी कैमरों से लैस हैं।


4. नर्सरी दड्बे (12x10x8') कृत्रिम ऊष्मायन द्वारा रची आवास घोंसलों के लिए हैं। नर्सरी दड्बो में घोंसलों के ताक पर बने घोंसले हैं जहां चार नेस्लिंग एक साथ रखे जा सकते हैं। एक बार में कम से कम 32 नेस्लिंग पालन की कुल क्षमता के साथ आठ नर्सरी दड्बे हैं।
5. तीन होल्डिंग दड्बे हैं, जिनमें से (60x40x20') आयाम का एक बड़ा दड़बा 10 जोड़े रखने की क्षमता के साथ, और (20x20x20') आयाम के दो छोटे दड्बे 2 जोड़े रखने की क्षमता के साथ। पक्षियों को नर्सरी दड्बो में उड़ने योग्य बनाने के बाद इन दड्बो में रखा जाता है। ये दड्बे पक्षियों के लिए एक छोर से दूसरे छोर तक पंख व्यायाम करने तथा फ्लैप उड़ान भरने के लिए काफी बड़े हैं।

6. केंद्र में दो प्रदर्शनी दड्बे (25x17x14') हैं। ये दड्बे इंटरप्रिटेशन कक्ष के काफी नजदीक हैं और केंद्र का दौरा करने वाले प्रशिक्षुओं के शिक्षण प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। इंटरप्रिटेशन कक्ष से इन दड्बो में गिद्धों को आसानी से देखा जा सकता है।




7. केंद्र में स्थापित जोड़ी को अलग अलग रखने के लिए आठ प्रजनन दड्बे (12x10x10') हैं। यह देखा गया है कि कुछ जोड़े कॉलोनी दड़बा में घोंसला करने में सहज नहीं होते हैं। ये जोड़े छोटे पक्षियों के हो सकते हैं जो पहली बार प्रजनन करने जा रहे हैं या किसी कारण से उप प्रमुख जोड़े हैं। कॉलोनी दड्बो में घोंसला करने (नेस्टिंग) का प्रयास करते समय इस तरह के जोड़े अन्य पक्षियों से परेशान हो जाते हैं। ये जोड़े आठ प्रजनन दड्बो में स्थानांतरित कर दिये गये जिनको नस्ले के लिए अलग जोड़े में रखने के लिए बनाया गया है।
(ख) प्रयोगशाला और पशु चिकित्सा देखभाल सुविधाएं

1. इंस्ट्रुमेंटेशन कक्ष (15x10x10') में सामान के साथ एक पीसीआर (पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन) मशीन है। ये उपकरण डीएनए का उपयोग करके प्रजनन करने वाले पक्षियों के लिए उपयोग किया जाता है। एक पूरी तरह से स्वचालित रक्त जैव रसायन मशीन है जो गिद्धों के रक्त सीरम में यूरिक एसिड, एल्बुमिन, कुल प्रोटीन और क्रिएटिन किनेस के स्तर को निर्धारित करने में मदद करता है। लैब में इएलआईएसए (ELISA) रीडर भी मौजूद है जो गिद्धों तथा मृत मवेशियों के शव पर डाईक्लोफेनाक की उपस्थिति का पता लगाता है।

2. रुधिर विज्ञान कक्ष (12x12x10') में गिद्ध के खून की जॉंच के लिए सभी सुविधाएं हैं। प्रयोगशाला में रक्त विज्ञान से संबंधित सभी आवश्यक उपकरण मौजूद हैं जैसे माइक्रोस्कोप, अपकेंद्रित मशीन, एक हिमोक्यू‍, एक रक्त मिक्सर और रक्तविज्ञान से संबंधित अन्य उपकरण एवं सहायक उपकरण मौजूद हैं।

3. बंद सर्किट टेलीविजन कैमरा मॉनिटर कक्ष (10x10x10') पक्षियों के अवलोकनों के लिए उपयोग किया जाता है। सभी चारों कॉलोनी दड्बे गिद्ध व्यवहार का अध्ययन करने के लिए सीसीटीवी कैमरों से लैस हैं। कैमरा धूपदान 360 डिग्री और 180 डिग्री तक झुक जाता है, इसमें 30X की एक ज़ूम है। कॉलोनी दड्बे के हर कोने में इन कैमरों की मदद से नजर रखी जा सकती है।
4. फ्रीजर रूम (12x10x10') में गिद्धों की महत्वपूर्ण ऊतकों के नमूनों के संग्रहण के लिए तीन -20 डिग्री सेल्सियस का फ्रीजर है।

5. इंटरप्रिटेशन सेंटर (24x18') इंटरप्रिटेशन सेंटर (24x18') लुप्तप्राय प्रजातियों की रिकवरी कार्यक्रम के तहत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार के वित्तीय सहयोग से अप्रैल 2013 में निर्माण किया गया था। यह विभिन्न वन और वन्य जीवन के स्कूलों से प्रशिक्षुओं को संरक्षण प्रजनन में प्रशिक्षण देने के लिए तथा भारत और विदेशों से जीवविज्ञानियों और वैज्ञानिकों की यात्रा के लिए उपयोग किया जाता है। यह प्रक्षेपण सुविधाओं से लैस और दड्बो में लगे हुए सीसीटीवी कैमरों के मॉनीटर हैं। केंद्र में प्रकाशित सभी सामाग्री, साथ ही जानकारी बुकलेट, पोस्टर और पाम्लेट केंद्र में उपलब्ध हैं।



अंतिम नवीनीकृत:  13/7/2013