संयुक्त वन प्रबंधन

        हरियाणा सरकार ने सत्तर के दशक के अन्त में राज्य में संयुक्त वन प्रबंधन शुरू की थी जो पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की नीति से बहुत पहले से बन गई थी। वनों की रक्षा के लिए गांव के स्थानीय लोगों को रोजगार के रूप में नियुक्त किया जा रहा है जिनको बदले में पानी और वन उपज के ऊपर अधिकार दिया गया है, हरियाणा के सुखो माजरी गांव में विकसित इस प्रकार का मॉडल विश्व प्रसिद्ध है। वनों के संचालन और वन प्रबंधन में भागीदारी दृष्टिकोण का अभ्यास राज्य में जारी रखा गया है। राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (एनएपी) के तहत गांव स्तर पर 817 गांवों में ग्राम वन समितियां (वीएफसी) गठित की गई है। इसके अलावा, 1135 ग्राम वन समितियां जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) के तहत भी गठित की गयी हैं (एकीकृत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन परियोजना और हरियाणा सामुदायिक वानिकी परियोजना (एचसीएफपी) के द्वारा वित्त पोषित)। इन सभी कार्यक्रमों / परियोजनाओं में, स्वयं सहायता समूहों के गठन और उन्हें आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए कुछ आय अर्जन गतिविधि शुरू करने के लिए प्रशिक्षण द्वारा उन्हें सहायता उपलब्ध कराकर महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए विशेष जोर दिया जा रहा है।

संयुक्त वन प्रबंधन की अवधारणा

         संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम वनों के संरक्षण एवं रखरखाव में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी के साथ उनकी सरकारी वन से संबद्ध उनके वानिकी संबंधी जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने का एक प्रयास है। वन विभाग इन क्षेत्रों में उन लोगों की वानिकी कार्यो मे सहभागिता ले रही है जो स्थानीय जरूरतों के साथ अधिकतम समकालीन हैं।सदभावना और विश्वास का माहौल बनाया जा रहा है जिससे लोग यह महसूस कर रहे हैं कि यह उनका अपना कार्यक्रम है और सरकार इसमें भाग ले रही है। विभाग तेजी से स्थानीय जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सुविधा के रूप में काम कर रहा है और बदले में पेड़ों की अवैध कटाई और चराई के द्वारा वनों की गिरावट को रोकने में उनकी सक्रिय भागीदारी चाहता है।

        वनों की गिरावट के रोकथाम के लिए सरकार द्वारा समय समय पर नियम बनाए गये हैं। इन नियमों का उद्देश्य मौजूदा वनों को संरक्षित और समृद्ध बनाने साथ ही ज्यादा से ज्यादा अपक्षरित क्षेत्रों को वृक्ष आच्छादन के तहत में लाना है। स्थानीय लोगों का इन वनों में जो अल्प अधिकार था वह इनकी वन उपज की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में अपर्याप्त था। मांग और आपूर्ति के बीच अंतर को पाटने के लिए लोग वह अवैध तरीका अपना रहे थे जिनका वन कर्मचारी विरोध करते थे। इस प्रकार ये कड़े नियमों और विनियमों ने स्थानीय लोगों के बीच अलगाव की भावना पैदा की जिससे वनों के वन कर्मचारी स्थानीय निवासियों की जायज मांगों और कल्याण को ध्यान में न रखते हुए केवल वन संरक्षण और अपने आधिकारिक कर्तव्य में रुचि रखते थे।

        पिछले कुछ दशकों से, वानिकी और ग्रामीण विकास के लिए इसके अनुप्रयोग की अवधारणा में एक जबरदस्त परिवर्तन आया है। अब यह तेजी से अनुभव किया जा रहा है कि वनों के संरक्षण और रखरखाव में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी के बिना वनों की गिरावट को रोकना असंभव है। जबकि ऐसा करने के लिए इन क्षेत्रों के स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को अच्छी तरह से समझना पड़ेगा तथा उन्हें जहां तक संभव हो सके पूरा करना पड़ेगा। इन घटनाओं को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की भूमिका, स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं को उनकी धारणाओं, मंशाओ, कमियों तथा प्राथमिकताओं के आधार पर पूरा करने के लिए, और अधिक सहायक, विचारशील तथा मिलनसार हो गयी है।

        सयुंक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) की अवधारणा को अब वन विभाग द्वारा किए जा रहे लगभग सभी वानिकी परियोजनाओं में बुना गया है। इसने शिवालिक तलहटी के साथ ही अरावली में सामान्य भूमि में भी अपनी जड़ें जमा ली हैं।

शिवालिक में संयुक्त वन प्रबंधन

फलोपभोग बंटवारा

        शिवालिक क्षेत्र में, आसपास के वन क्षेत्रों से भब्बर घास (Eolaliopsis binata) को पहले ठेकेदारों को नीलाम किया जाता था, लेकिन जेएफएम के तहत ही वन विभाग द्वारा तय आरक्षित मूल्य पर हिल संसाधन प्रबन्धन समिति (एचआरएमएस) को दिया जाता है। सोसायटी खुली नीलामी में अधिशेष भब्बर बेच सकते हैं। भब्बर की बिक्री से प्राप्त शुद्ध आय को 25:75 के अनुपात में सरकार और एचआरएमएस के बीच विभाजित किया जाएगा। एचआरएमएस, क्षेत्र में सुधार के लिए अपनी हिस्सेदारी का 30% और योगदान करेगा। यह निधि अलग बैंक खाते के रूप में संयुक्त रूप से डीएफओ तथा एचआरएमएस से संबंधित पदाधिकारियों द्वारा संचालित, संसाधन प्रबन्धन समिति की सामान्य निकाय से अनुमोदित, प्रत्येक संसाधन प्रबन्धन समिति द्वारा बनाए रखी जायेगी। इसके अलावा 10% कल्याण कोष में योगदान दिया जायेगा और उसका खाता डीएफओ द्वारा अनुरक्षित किया जायेगा। सामान्य निकाय द्वारा तय की गई बाकी की रकम को गांव और समुदाय के विकास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह निधि सिर्फ गैर धार्मिक और गैर राजनीतिक गतिविधियों पर ही उपयोग करने के लिए है।

        संयुक्त वन प्रबन्धन कार्यक्रम से प्राप्त लाभ, वन क्षेत्रों में उत्पादन में वृद्धि के साथ ही जल संचयन डैम सभी परिवारों के बीच समान रूप से वितरित किये जा रहे हैं। कोई ऐसा ब्यक्ति जिसके पास भूमि नहीं है वह अपने हिस्से का पानी भूमि मालिकों को बेच सकता है। एचआरएमएस के एक लंबे समय से चली आ रही मांग, वन क्षेत्रों में पेड़ फसल में एक हिस्सेंदारी की थी, जो अब मिल चुकी है और सोसायटी धन का 30% उत्पन्न करने का हकदार है।






अंतिम नवीनीकृत:  27/6/2013