लाल जंगली मुर्गी
हरियाणा में लाल जंगली मुर्गी का संरक्षण

         लाल जंगली मुर्गी भारत में प्राय: सभी साल वनों में पायी जाती हैं। यह मलेशिया, इंडोनेशिया और पूर्वी क्षेत्र के आसपास के देशों में भी पायी जाती थी जहां से अब इसके विलुप्त होने की सूचना है। जंगल में लाल मु्र्गी के बंधत्वो और आनुवंशिक अखंडता के विषय को देर से उठाया गया था। जंगली लाल मुर्गी की शुद्धता के बारे में यह बात महत्वपूर्ण है कि जंगली जीन अक्सर रोग प्रतिरोध की कुंजी होती है। घरेलू मुर्गी के जीन के साथ विलय के कारण लाल जंगली मुर्गी खतरे में पड़ गयी।
        लाल जंगली मुर्गी उन चार जंगली मुर्गियों में से एक है जो भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाती हैं, लाल जंगली मुर्गी जीनस गैलस से संबंधित है, अन्य तीन भूरी हैं और श्रीलंका तथा ग्रीन से संबंधित हैं । लाल जंगली मुर्गी दिखने में सबसे अलग होती है, इसके ऊँचे रंगीन पंख और राजसी लाल कलगी इसे एक सुंदर पक्षी बनाते हैं। इसके गाढ़े पंख इसे अन्य पालतू पक्षियों से अलग बनाते हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार लाल जंगली मुर्गी 2500-2100 ई.पू. के आसपास सिंधु घाटी में हड़प्पा और मोहन जोदड़ो में पालतू थी। पालतू होने की वजह से लाल जंगली मुर्गी दुनिया के अन्य भागों में ले जाया गया और दुनिया भर में घरेलू मुर्गियों की विभिन्न नस्लों के विकास में इसने योगदान दिया। भारत, लाल जंगली मुर्गी का मूल देश होने के बावजूद बाहर से पोल्ट्री का आयात कर रहा है। यह इस बात की सूचना देता है कि लाल जंगली मुर्गी की जंगली आबादी को, घरेलू या अन्या जंगली मुर्गियों से दूषित किया गया है।
        फिर भी यह मत है कि गैर दूषित लाल जंगली मुर्गी अभी भी मौजूद हैं जिन्हें बचाने की आवश्यकता है। वन संसाधनों में गिरावट और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण कई वन्यजीव प्रजातियों की आबादी में एक चिन्ताजनक स्तर तक कमी आई है। 1990 के शुरूआत में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिन्हित लुप्त प्राय प्रजातियों के संरक्षण की आवश्यकता है। हरियाणा वन विभाग ने उपलब्ध स्थानीय तीतर पक्षी की प्रजातियों में वृद्धि, उनके प्रजनन और प्रकृति में उनके वंश विस्तार की दृष्टि से वर्ष 1991-92 और 1992-93 के दौरान, पंचकूला से लगभग 30 किमी दूर मोरनी में एक तीतर पक्षी प्रजनन केंद्र की स्थापना की। शुरू में यह विचार था कि यह केन्द्र लाल जंगल पक्षियों, चियर तीतर, कलिज तीतर, और चकोर की प्रजातियों में विस्तार करेगा लेकिन बाद में रेड जंगल पक्षियों और कलिज तीतर पर मुख्य रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया।
मोरनी तीतर प्रजनन केंद्र
         छ: चिडि़याखाना (पक्षी शालाएं) और एक चलित चिडि़याखाना का तीतर के प्रजनन के लिए निर्माण किया गया है। वर्ष 1992-93 से 1995-96 के दौरान कुछ अंडे जंगल से एकत्र किए गए थे और केंद्र में इससे बच्चे निकाले गये। 1996 के बाद पक्षियों की आबादी में सबसे अधिक वृद्धि प्रजनन केंद्र में ही हुई है हालाकि, अंडे सेने के लिए बच्चे वाली मुर्गी की मदद ली गई थी। वर्ष 1998-99 के दौरान 1998 की गर्मी में 14 पक्षी पैदा हुए जिन्हें जंगल क्षेत्र में छोड़ दिया गया। वर्ष 1999 में 7 तथा 2000 में फिर से 10 पक्षियों को जंगल में छोड़ा गया। इस प्रकार सभी 31 उप वयस्क पक्षियों को पहले से चुने हुए पक्षियों के निवास के लिए उचित जगहों में छोड़ा गया।
आनुवंशिक अध्ययन
        नवंबर-दिसंबर 1998 में निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने वन विभाग को लाल जंगल पक्षी पर आनुवंशिक अध्यंयन शुरू करने का सुझाव दिया। इस मामले में जनवरी, 1999 में आयोजित राज्य वन्यजीव सलाहकार बोर्ड की बैठक में चर्चा की गई लेकिन कुछ कारणों से आनुवंशिक अध्ययन पर काम शुरू नहीं किया जा सका। हरियाणा सरकार ने 2001 में लाल जंगल पक्षियों की आनुवंशिक अध्ययन की निगरानी के लिए अधिकारियों की एक समिति गठित की और परियोजना के वित्तपोषण के लिए एक प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा, जिसने वर्ष 2002-03 के दौरान इसके लिए धनराशि प्रदान की। इस अध्ययन को शुरू करने के लिए सीडीएफडी (सेंटर फार डीएनए फिंगर प्रिंटिग एंड डायग्नोशस्टिक, भारत सरकार की जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एक स्वायत्त केन्द्र) हैदराबाद से संपर्क किया गया था।
         तीतर प्रजनन केन्द्र मोरनी से 25, बीड़ शिकारगाह के जंगल से 21, कलेसर के जंगल से 10 पक्षियों के रक्त के नमूने नवंबर, 2002 से दिसंबर 2003 के बीच एकत्र किए गए थे। इसके अलावा बीड़ शिकारगाह जंगलों के आसपास के तीन गांवों से घरेलू पक्षियों के रक्त के नमूने एकत्र किए गए थे। सीडीएफडी ने भी भूरी जंगली पक्षियों के रक्त के नमूने लेने के लिए अनुरोध किया। इन नमूनों को मुख्य वन्यजीव संरक्षक कर्नाटक और मुख्य वन्यजीव संरक्षक तमिलनाडु द्वारा अपने बनेर्घट्टा, मैसूर तथा वेंडलूर चिडि़याघरों से उपलब्ध कराया गया। प्रारंभिक आनुवंशिक अध्ययन सीडीएफडी के द्वारा पूरा किया गया है लेकिन भविष्य में आनुवंशिक अध्ययन तथा संरक्षण अध्ययन को व्यवस्थित ढंग से शुरू किए जाने की आवश्यकता है।

लाल जंगली मुर्गी, भारतीय घरेलू मुर्गियों के आण्विक आनुवंशिक विश्लेषण और अन्य गैलस प्रजातियों के साथ उनके रिश्ते

जे. नागाराजू, सीडीएफडी, हैदराबाद

        यदि लाल जंगली मुर्गी और घरेलू मुर्गी में किसी भी प्रकार का आनुवंशिक मिश्रण है इस विषय पर अध्ययन सीडीएफडी हैदराबाद के सहयोग से हरियाणा वन विभाग के द्वारा शुरू किए गए थे। अध्ययन में दो अलग अलग स्थानों से कुल 31 जंगली पक्षियों को शामिल किया गया, जिनमें कलेसर से 10 और बीड़ शिकारगाह जंगल से 21 पक्षी शामिल थे।
        पुरातत्व अध्ययन ने यह संकेत दिया है कि, सभी मुर्गियों का मूल (जननी) दक्षिण पूर्व एशियाई लाल जंगली मुर्गी (RJF) [Gallus] है। पालतू मुर्गी को सिंधु घाटी में देखा गया है [Zeuner 1963]। भारत में पालतू मुर्गी की उत्पत्ति 3200 ईसा पूर्व तथा, चीन और मिस्र में 1400 ईसा पूर्व हो सकती है। जब लोगों ने मुर्गी को पालना शुरू किया तो शायद गैलस दुनिया के अन्य भागों में भी फैल गया। [स्टीवन, एल., 1991, पीटर्सन और ब्रिस्बिन, 1999]। लेकिन, सवाल सिंधु घाटी से उठाए गए हैं [West and Zhou, 1989], तथा मुर्गी को पालतू बनाने के कई और स्वतंत्र घटनाओं की सूचना दी गई है [Fumihito et. Al. 1996]
        जीनस गैलस, चार जंगली प्रजातियों से बना है G. gallus [RJF], G. varius [Green JF], G. sonneratti [Grey JF] and G. lafayettei [Lafayett JF]। जीनस गैलस प्रजातियों के 5 उप प्रजातियां पायी जाती हैं- G. gallus species, G. g. spadiceus, G. g. bankiva, G. g. murghi और G. g. jabouillei [Niu et al; 2002]। अनुमान के मुताबिक 12 वर्ग और लगभग 60 नस्लों में बंटी हुई मुर्गियों की कुल 175 किस्में हैं।
        हाल ही में, जंगल में जंगली मुर्गी के आनुवंशिक अखंडता और संरक्षण की स्थिति, तथा उनके मुर्गीपालन संग्रह के संबंध में विचार उठाए जा रहे हैं। अनेक प्रकार की सामान्य बीमारियां जो मुर्गीपालन उद्योग को प्रभावित करती हैं वे लाल जंगली मुर्गी को भी प्रभावित करती हैं। यह माना जाता है कि घरेलू मुर्गियां लाल जंगली मुर्गी के साथ संकर करके उत्पन्न की जा रही हैं, यह संरक्षणवादियों के लिए चिंता की बात है क्योंकि जंगली जीन प्राय: रोग प्रतिरोध के काम आती है तथा इनके घरेलू मुर्गियों के साथ मिलना लाल जंगली मुर्गियों के लिए खतरा है।
         यह समझने के लिए कि लाल जंगली मुर्गी के आबादी की आनुवंशिक मिश्रण होने वाली हैं, जंगल में लाल जंगली मुर्गी की मिश्रित आबादी है, भारतीय घरेलू पक्षियों की वंशावली की स्थिति पता लगाने के लिए, दूसरे देशों में पाये जाने वाले मुर्गियों से लाल जंगली मुर्गी के क्या संबंध हैं, हमने माइक्रोसेटेलाइट और माइटोकॉं‍ड्रियल डी-लूप डीएनए अनुक्रमण का उपयोग कर आणविक लक्षण का वर्णन शुरू किया। वर्तमान अध्ययन में हमने 56 लाल जंगली मुर्गियों को प्रयोग किया [कलेसर वन क्षेत्र से 10, मोरनी हिल्स़ क्षेत्र से 25, और बीड़ शिकारगाह, हरियाणा क्षेत्र से 21] 4 भूरी (ग्रे) मुर्गियां [कर्नाटक चिड़ियाघरों से 3 और तमिलनाडु के चिड़ियाघर से 1] 16 घरेलू मुर्गियां [हरियाणा के तीन गांवों से]।
         माइक्रोसेटेलाइट मार्कर विश्लेषण 11 स्थलों में किया गया जिनमें से सभी बहुरूपी थे। प्रति लोकस, एलेल्स की संख्या 2.91 से [भूरी जंगल मुर्गियां] 6.09 तक [बीर शिकारगाह आबादी] एक मध्यम विषमयुग्मजी दिखाता है। विषमयुग्मजी मान कलेसर आबादी में 0.51 से बीड़ शिकारगाह आबादी 0.61 तक। एफ-स्टेुट प्रोग्राम का उपयोग करके फिक्शेासन इंडेक्सम मान [FST] निकाला गया और FST ने घरेलू पक्षी की आबादी के बीच एक मध्यम संबंध का सुझाव दिया। तुलनात्मक रूप से, एफ एस टी मूल्य से लाल जंगल मुर्गियों के बीच आनुवंशिक विभिन्नता [.1428-0.2399], घरेलू पक्षियों में पाये गये आनुवंशिक विभिन्नता [0.1116 to 0.1365] की तुलना में अधिक है। घरेलू पक्षियों और FJF [साथ ही ग्रे जेएफ] के बीच 0.3 से ऊपर एफ एस टी मूल्य, इन दो आबादियों के बीच एक बहुत अधिक आनुवंशिक भेदभाव का संकेत है जो लाल जंगली मुर्गी और घरेलू पक्षियों के बीच पार संकरण का सुझाव नहीं देता।
        माइटोकॉं‍ड्रियल से अनुक्रमणित डी-लूप डीएनए प्राइमर्स का उपयोग करके पूरा किया गया जो क्षेत्रों को बढ़ाता है । अधिकतम संभावना विधि का उपयोग करके भारतीय लाल जंगल मुर्गी के लिए वंशावली वृक्ष का निर्माण किया गया है तथा भारतीय घरेलू पक्षी प्रदर्शित करते हैं कि मुर्गियों के दो प्रमुख समूह थे। ग्रे JFs ने एक समूह का गठन किया है जबकि बाकी दूसरे पक्षियों जिसमें घरेलू मुर्गियां और लाल जंगली मुर्गी भी शामिल है ने दूसरे समूह का गठन किया है। लाल जंगली मुर्गी के समूह में मुख्य रूप से दो उप समूह देखे गये, एक घरेलू पक्षी के साथ तथा दूसरा लाल जंगली मुर्गी के साथ। लगभग सभी घरेलू पक्षियों मे आपस मे आनुवांशिक विषमता पाई गई। इन घरेलू पक्षियों ने टी से सी संस्करण में परिवर्तन किया, जो किसी भी लाल जंगली मुर्गी में नहीं मिलता [मोरनी हिल्स क्षेत्र से एकत्र एक पक्षी को छोड़कर]। एक अलग उप उप समूह में RJF से देसी पक्षियों के पृथक्करण से पता चलता है कि घरेलू पक्षियों के साथ RJF का कोई पार संकरण नहीं है। हालाकि, परिणाम हमें यह भी बताते हैं कि घरेलू पक्षी, RJF के ही अंश हैं या वे बाद में प्राप्त किये गये हैं।





अंतिम नवीनीकृत:  22/6/2013