मृदा एवं जल संरक्षण

        एक कृषि प्रधान समाज की जीवन रक्षा कृषि उत्पादकता पर निर्भर करती है जो सीधे तौर पर पृथ्वी के ऊपर की मिट्टी तथा नमी से संबंधित है। शीर्ष मिट्टी और नमी उपलब्धता पर वनों की कटाई का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। विरल या कम वनस्पति के कारण मिट्टी का उच्च कटाव, गाद, और बाढ़ को बढ़ावा मिलता है। उत्तरी हरियाणा में शिवालिक पहाड़ियां राज्य के एक बड़े हिस्से के लिए एक प्रमुख वाटरशेड का निर्माण करते हैं। इन पहाड़ियों को बहुत कम वन आवरण के कारण नुकसान हो रहा है। नतीजतन, मानसून के दौरान भारी मिट्टी का कटाव होता है। ऊपरी मिट्टी के संरक्षण के लिए, बाढ़ के प्रकोप को कम करने लिए और भूजल व्यवस्था में सुधार के लिए विभिन्न वनस्पति, यांत्रिक, मृदा एवं जल संरक्षण के उपाय अपनाए जा रहे हैं।

मृदा एवं जल संरक्षण संरचनाएं :

         मिट्टी के कटाव को कम करने, लंबाई और ढलान की डिग्री को तोड़ने तथा पहाड़ी सतहों तथा चैनल बैंकों की सफाई और कटाई रोकने के लिए, तथा चैनल बेड ढलानों के निर्माण के लिए जलग्रहण क्षेत्र उपचार, जैविक उपचारात्मक उपायों और सामाजिक बाड़ के पहलुओं को लेकर संरचनात्मक उपायों द्वारा किया जाता है।

        संरचनात्मक उपायों में कंपित समोच्च खाइयां, परिधीय खाइयां, गली प्लग, स्पुतर्स, स्टड, चैक डैम, गाद प्रतिधारण बांध, प्रासंगिक क्रेटवायर संरचनाएं और ड्रॉप संरचनाएं शामिल हैं।

        जैव उपचारात्मक उपायों में झाड़ - झंखाड़ / वनस्पति चेक चैनलों में बांध, एक या दो पंक्तियों में वनस्पति स्पुडर्स, वनस्पति फिल्टर और घास बाधाएं, वनस्पति अवनालिका प्लग तथा पौधे लगाने और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बायोमास के साथ पलवार द्वारा जल संचय क्षेत्र का स्थिरीकरण शामिल हैं।

         संरचनात्मक और जैव उपचारात्मक उपायों के अलावा, लोगों की सक्रिय भागीदारी के साथ पशु चराई और वनस्पाति की अवैध कटाई के लिए प्रभावी नि‍षेध, खराब जलग्रहण के पुनर्वास में एक प्रभावी सामाजिक बाड़ का उपाय हो सकता है। इसके लिए स्थानीय लोगों, गैर सरकारी संगठनों और जनता के पदाधिकारियों के बीच में जागरूकता और प्रेरणा दोनों आवश्यहक हैं।

जल संचयन संरचना

        जल संचयन शब्द का वास्तविक अभिप्राय किसी खेत के पानी का संग्रह और उसका भंडारण सिंचाई के उपयोग के लिए जल प्रवाह या क्रीक फ्लो के रूप में करना है। बाद में संशोधन की प्रक्रिया में, परिभाषा के दायरे में वृद्धि की गई जिसके अनुसार वाटरशेड जलग्रहण से भंडारण संरचना में प्राकृतिक वर्षा के एकत्रीकरण की प्रक्रिया को जल संचयन कहते हैं। जल संचयन, शिवालिक पहाड़ी क्षेत्र में सिंचाई का एक प्रमुख स्रोत है, वहां सिंचाई के अन्य स्रोतों को विकसित करने की कोई संभावना नहीं है।

        यह महसूस किया गया है कि पानी सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोत्तम वन उपज है। इस संसाधन का अधिक से अधिक संचयन बढ़ते हुए कृषि उत्पादन के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहल है। इस गतिविधि की शुरूआत लगभग 25 साल पहले की गयी थी और शिवालिक व अरावली में 200 से अधिक वर्षा जल संचयन संरचना का निर्माण किया जा चुका है। राज्य में पानी के संरक्षण के लिए अरावली व शिवालिक पहाड़ियों में, समेकित वाटरशेड और वनीकरण परियोजनाएं तैयार की जा रही हैं। इन परियोजनाओं के कार्यान्वयन से कृषि फसलों की उत्पादकता और दुधारू पशुओं की उपज में सुधार होगा। 'गांव के तालाब' के पुनर्वास का नया विचार वन विभाग द्वारा शुरू किया गया है। गावों में स्थित जोहड़ जिसने पहले के समय में, गांव में पानी के विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी का भंडारण का उद्देश्य पूरा किया था उनके अनुप्रयोग के कारण धीरे-धीरे अवनति की कगार पर पहुँच रहे हैं। इस गांव के तालाबों में से कई तालाबों का जेआईसीए प्रोजेक्ट और राज्य योजनाओं के तहत पुनर्वास किया गया है।

         सामग्री और डिजाइन को ध्यान में रखते हुए जल संचयन संरचना में अर्थफिल बांध, पत्थर की चिनाई का बांध, पानी टपकन बांध और उपसतह बांध शामिल हैं। उपसतह बांध, सिंचाई और जल आपूर्ति के लिए उपसतह चैनल पानी का दोहन करने के लिए एक नई खोज है।






अंतिम नवीनीकृत:  26/6/2013